शनि अमावस्या 2025: 29 मार्च को शुभ मुहूर्त और सूर्य ग्रहण की स्थिति जानें। शनि देव की पूजा, दान और पितृ दोष से मुक्ति के उपाय। इस दिन का धार्मिक महत्व और दान की महिमा भी समझें।
भारत के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास में नव संवत्सर का विशेष स्थान है। यह केवल एक नए वर्ष का आरंभ नहीं, बल्कि सृष्टि की उत्पत्ति, धर्म, आस्था और संस्कृति का संगम है।
सनातन संस्कृति में नवरात्रि को विशेष रूप से दिव्य और शक्तिशाली उत्सव माना गया है। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, साधना और भक्ति का अनुपम संगम है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक मनाए जाने वाले चैत्र नवरात्रि में भक्त श्रद्धा और समर्पण के साथ माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की उपासना करते हैं।
क्या आपने कभी देने की सच्ची खुशी महसूस की है? वह पल, जब आपकी मदद से किसी की आँखों में उम्मीद की चमक आ जाती है—क्या आपने उसे करीब से देखा है? दान केवल सहायता नहीं, बल्कि जीवन को छूने और बदलने की शक्ति है। यह एक ऐसी अनुभूति है, जो शब्दों से परे, दिल से दिल तक पहुँचती है। आइए समझते हैं कि देने की यह गूंज हमारे जीवन को कैसे संवारेगी और हम मिलकर किसी और की दुनिया को पहले से भी उज्जवल कैसे बना सकते हैं!
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह व्रत न केवल आत्मशुद्धि का माध्यम है, बल्कि यह ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का भी श्रेष्ठ मार्ग माना जाता है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहते हैं।
इस दुनिया में गरीबी, असमानता और पर्यावरणीय क्षति जैसी गंभीर समस्याएँ दिन प्रतिदिन बढ़ रही हैं। इन चुनौतियों का समाधान निकालने के लिए हमें प्रभावी प्रयासों की जरूरत है। भारत और दुनिया भर में कई लोग और संगठन इन समस्याओं को हल करने के लिए काम कर रहे हैं।
अगर आप किसी धर्मार्थ संस्थान (NGO) को दान करते हैं और सोचते हैं कि इनकम टैक्स में छूट का लाभ उठाना मुश्किल है, तो यह ब्लॉग आपके लिए है। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80G के तहत फॉर्म 10BD और फॉर्म 10BE को अनिवार्य कर दिया है, ताकि दानदाता पारदर्शी तरीके से टैक्स छूट का लाभ ले सकें।
क्या आप जानते हैं कि समाज सेवा के साथ-साथ आप अपना टैक्स भी बचा सकते हैं? जी हां! भारत सरकार ने ऐसे नियम बनाए हैं जिससे आप किसी पंजीकृत एनजीओ (NGO) को दान देकर इनकम टैक्स में छूट प्राप्त कर सकते हैं।
होली की मस्ती जब थमने लगती है और रंगों का असर धीरे-धीरे कम होने लगता है, तब आता है एक और पावन पर्व—भाई दूज। यह त्यौहार भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक है, जो हर साल होली के दो दिन बाद मनाया जाता है।
भारत में त्यौहारों की एक अनूठी परंपरा है, और इन त्यौहारों में होली का स्थान सबसे निराला है। यह केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि हृदयों का मिलन और जीवन में उमंग भरने वाला पर्व है। जब गुलाल हवा में उड़ता है, तो ऐसा लगता है जैसे आसमान भी इस रंगीन उत्सव का हिस्सा बन गया हो।
सनातन संस्कृति में एकादशी का विशेष महत्व है। हर महीने दो बार आने वाली यह तिथि केवल उपवास और व्रत का ही प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, भक्ति और मोक्ष की ओर बढ़ने का मार्ग भी है।
प्रयागराज की पावन भूमि पर, जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम होता है, वहाँ 144 वर्षों बाद महाकुंभ का दिव्य आयोजन संपन्न हुआ। सनातन संस्कृति की इस अनमोल धरोहर में करोड़ों श्रद्धालुओं ने पुण्य स्नान, जप-तप और दान कर अपने जीवन को कृतार्थ किया।